हरियाणा में बिजली की दरें आम आदमी के जीवन से सीधे जुड़ा हुआ विषय हैं, क्योंकि आज के समय में बिजली केवल सुविधा नहीं बल्कि जरूरत बन चुकी है। घरों की रोशनी से लेकर खेती, उद्योग, व्यापार और शिक्षा तक हर क्षेत्र बिजली पर निर्भर है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि हरियाणा में बिजली कितने रुपये प्रति यूनिट है, यह दरें कैसे तय होती हैं और पिछले पांच वर्षों में इनमें क्या बदलाव आया है। यह विषय केवल बिल की रकम तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे राज्य की आर्थिक स्थिति, ऊर्जा नीति और उपभोक्ता हित भी जुड़े हुए हैं।
हरियाणा में बिजली की दरें राज्य के हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग (HERC) द्वारा तय की जाती हैं। यह आयोग हर साल या आवश्यकता अनुसार टैरिफ ऑर्डर जारी करता है, जिसमें यह निर्धारित किया जाता है कि घरेलू, कृषि, औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं से प्रति यूनिट कितनी राशि ली जाएगी। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए लागू दरें 1 अप्रैल 2025 से प्रभावी हुई हैं। वर्तमान में घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली की दरें खपत के स्लैब के आधार पर तय की गई हैं, जिसमें कम यूनिट खपत करने वालों को अपेक्षाकृत सस्ती बिजली और अधिक खपत करने वालों को महंगी बिजली दी जाती है।
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार हरियाणा में 0 से 50 यूनिट तक बिजली उपयोग करने वाले घरेलू उपभोक्ताओं को लगभग 2.20 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली मिल रही है। 51 से 100 यूनिट तक यह दर करीब 2.70 रुपये प्रति यूनिट हो जाती है। 101 से 150 यूनिट तक दर लगभग 2.95 रुपये प्रति यूनिट है। इसके बाद 151 से 300 यूनिट तक बिजली उपयोग करने वालों के लिए दर अचानक बढ़कर करीब 5.25 रुपये प्रति यूनिट हो जाती है। 301 से 500 यूनिट तक यह दर लगभग 6.45 रुपये प्रति यूनिट और 500 यूनिट से अधिक खपत करने पर करीब 7.10 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच जाती है। इस ढांचे का उद्देश्य यह है कि कम आय और कम खपत वाले उपभोक्ताओं को राहत दी जा सके, जबकि अधिक खपत करने वालों से वास्तविक लागत वसूली जा सके।
अगर पिछले पांच वर्षों की बात की जाए तो हरियाणा में बिजली दरों का सफर काफी दिलचस्प रहा है। वर्ष 2020-21 के आसपास राज्य सरकार और बिजली विभाग ने घरेलू उपभोक्ताओं को बड़ी राहत दी थी। उस समय 0 से 50 यूनिट और 51 से 100 यूनिट तक की दरों में उल्लेखनीय कटौती की गई थी, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग को सीधा फायदा मिला। उस दौर में सरकार की नीति थी कि आम आदमी पर बिजली का बोझ कम रखा जाए, क्योंकि कोविड महामारी और आर्थिक मंदी के कारण लोगों की आमदनी पहले ही प्रभावित हो चुकी थी।
2021-22 और 2022-23 के दौरान हरियाणा में बिजली की दरों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया। इन वर्षों में टैरिफ को लगभग स्थिर रखा गया, ताकि उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। हालांकि इस दौरान बिजली वितरण कंपनियों, जैसे DHBVN और UHBVN, पर घाटे का दबाव बढ़ता गया। बिजली खरीद की लागत, कोयले और गैस की कीमतें, ट्रांसमिशन खर्च और रखरखाव की लागत लगातार बढ़ती रही, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक कारणों से दरों में तत्काल बढ़ोतरी नहीं की गई।
2023-24 और 2024-25 के समय तक स्थिति यह हो गई कि वितरण कंपनियों का घाटा काफी बढ़ चुका था। ऐसे में हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग के सामने यह चुनौती थी कि एक तरफ उपभोक्ताओं को राहत दी जाए और दूसरी तरफ बिजली कंपनियों को आर्थिक रूप से मजबूत भी किया जाए। इसी संतुलन के तहत 2025-26 में दरों में सीमित बढ़ोतरी की गई। यह बढ़ोतरी प्रति यूनिट 20 से 30 पैसे के आसपास रही, जो देखने में भले ही छोटी लगे, लेकिन बड़े उपभोक्ताओं के बिल पर इसका असर साफ दिखाई देता है।
पिछले पांच वर्षों में एक बड़ा बदलाव यह भी हुआ है कि बिजली बिल की संरचना बदली गई है। पहले हरियाणा में Minimum Monthly Charges यानी न्यूनतम मासिक शुल्क लिया जाता था, भले ही उपभोक्ता ने बिजली कम इस्तेमाल की हो। अब इस व्यवस्था को कई श्रेणियों में हटाया गया है और उपभोक्ताओं से केवल वास्तविक खपत के आधार पर ही भुगतान लिया जा रहा है। इससे उन लोगों को राहत मिली है जो महीने में बहुत कम बिजली का उपयोग करते हैं, जैसे बुजुर्ग, छोटे परिवार या ग्रामीण क्षेत्र के उपभोक्ता।
बिजली दरों में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण बिजली उत्पादन और खरीद की बढ़ती लागत है। हरियाणा अपनी जरूरत की पूरी बिजली खुद पैदा नहीं करता, बल्कि उसे अन्य राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों से बिजली खरीदनी पड़ती है। कोयले की कीमत, परिवहन खर्च, थर्मल पावर प्लांट्स का रखरखाव और पर्यावरण मानकों का पालन करना — ये सभी चीजें बिजली को महंगा बनाती हैं। इसके अलावा नवीकरणीय ऊर्जा, जैसे सोलर और विंड पावर, को बढ़ावा देने के लिए भी बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश करना पड़ता है, जिसका असर अंततः टैरिफ पर पड़ता है।
घरेलू उपभोक्ताओं पर इन दरों का सीधा असर उनके मासिक बजट पर पड़ता है। जिन परिवारों की खपत 100 से 150 यूनिट के भीतर रहती है, उनके लिए बिजली अभी भी तुलनात्मक रूप से सस्ती कही जा सकती है। लेकिन जैसे ही खपत 200 या 300 यूनिट के पार जाती है, बिल में तेजी से वृद्धि दिखाई देने लगती है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में ऊर्जा बचत, LED बल्ब, इन्वर्टर एसी और सोलर पैनल जैसी चीजों की मांग बढ़ी है। लोग अब बिजली बिल को नियंत्रित करने के लिए तकनीकी विकल्प अपनाने लगे हैं।
पिछले पांच सालों की तुलना करें तो यह साफ दिखाई देता है कि हरियाणा सरकार ने सीधे तौर पर भारी दर वृद्धि करने से बचने की कोशिश की है। दरों में अचानक उछाल के बजाय धीरे-धीरे संरचनात्मक बदलाव किए गए हैं। एक तरफ सस्ती बिजली के स्लैब को बनाए रखा गया है, वहीं दूसरी तरफ अधिक खपत करने वालों से लागत के अनुसार भुगतान लेने की नीति अपनाई गई है। इससे सामाजिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया है।
आने वाले वर्षों में हरियाणा में बिजली दरों का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य नवीकरणीय ऊर्जा में कितना निवेश करता है और वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति कितनी सुधरती है। यदि सोलर और ग्रीन एनर्जी का उपयोग बढ़ता है और तकनीकी नुकसान कम होते हैं, तो संभव है कि बिजली दरों में स्थिरता आए। लेकिन यदि ईंधन की कीमतें और बिजली खरीद लागत बढ़ती रहीं, तो दरों में आगे भी संशोधन देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो हरियाणा में बिजली की दरें पिछले पांच वर्षों में बहुत तेजी से नहीं बढ़ीं, लेकिन बिलिंग सिस्टम और ढांचे में बदलाव के कारण आम उपभोक्ता को फर्क जरूर महसूस हुआ है। आज बिजली केवल एक सेवा नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक और सामाजिक नीति का अहम हिस्सा बन चुकी है। इसलिए हरियाणा में बिजली की प्रति यूनिट कीमत को समझना केवल बिल देखने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके पीछे की पूरी प्रक्रिया और पिछले वर्षों के बदलावों को भी समझना जरूरी है।





