हरियाणा की राजनीति में यदि किसी नेता को “किसानों का मसीहा” कहा गया, तो वह नाम था चौधरी देवीलाल। सादगी, संघर्ष और जनआंदोलनों की ताकत से सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाले देवीलाल भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में थे, जिन्होंने गांव, खेत और खलिहान की आवाज़ को सीधे दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाया। उनका जीवन केवल सत्ता प्राप्त करने की कहानी नहीं, बल्कि जनसंघर्ष, त्याग और राजनीतिक साहस की जीवंत गाथा है।
ताऊ का जन्मस्थल-
चौधरी देवीलाल का जन्म 25 सितंबर 1914 को हरियाणा (तत्कालीन पंजाब प्रांत) के चौटाला गांव में एक जाट किसान परिवार में हुआ। बचपन से ही उनमें नेतृत्व के गुण दिखाई देने लगे थे। युवा अवस्था में वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलनों में भाग लिया। इसी दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम का यह अनुभव उनके राजनीतिक जीवन की नींव बना।
राजनिति की शुरुआत
आजादी के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। वे कांग्रेस से जुड़े और 1952 में पहली बार पंजाब विधानसभा के सदस्य बने। उस समय हरियाणा अलग राज्य नहीं था, बल्कि संयुक्त पंजाब का हिस्सा था। देवीलाल ने किसानों के मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया। सिंचाई, बिजली, समर्थन मूल्य और कर्ज माफी जैसे विषय उनके राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में रहे।
हरियाणा के मुख्यमंत्री बने
1966 में जब हरियाणा राज्य का गठन हुआ, तब हरियाणा की राजनीति में नई संभावनाएं खुलीं। देवीलाल ने इस नए राज्य में किसानों के हितों की राजनीति को मजबूती दी। 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी की लहर चली और देवीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। यह उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने ग्रामीण विकास, सड़क निर्माण और किसानों के कल्याण की योजनाओं को प्राथमिकता दी।
जब पार्टी ने प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई
हालांकि राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहे। 1980 के दशक में उन्होंने कांग्रेस से अलग राह पकड़ी और क्षेत्रीय राजनीति को मजबूत किया। 1987 में हरियाणा में उन्होंने एक बड़ी राजनीतिक जीत दर्ज की। उनकी पार्टी ने प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई और वे दोबारा मुख्यमंत्री बने। इस दौरान उन्होंने किसानों के कर्ज माफ करने और बिजली-पानी की दरों में राहत देने जैसे फैसले लिए, जिससे वे ग्रामीण जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए।
देश के उप प्रधानमंत्री बने
देवीलाल की राजनीति केवल हरियाणा तक सीमित नहीं रही। 1989 में जब देश में सत्ता परिवर्तन हुआ और जनता दल के नेतृत्व में सरकार बनी, तब वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने और देवीलाल को देश का उप प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। यह हरियाणा के लिए गर्व का क्षण था कि एक किसान नेता दिल्ली की सत्ता में इतने बड़े पद पर पहुंचा। उप प्रधानमंत्री के रूप में भी उन्होंने किसानों और ग्रामीण भारत के मुद्दों को प्रमुखता दी।
राजनीतिक यात्रा में रोचक मोड़
उनकी राजनीतिक यात्रा में कई रोचक मोड़ आए। एक समय ऐसा भी आया जब उनका प्रधानमंत्री पद को लेकर नाम चर्चा में रहा, लेकिन उन्होंने स्वयं पद की दौड़ से हटकर वी.पी. सिंह का समर्थन किया। यह निर्णय उनकी राजनीतिक सोच और रणनीति को दर्शाता है। हालांकि बाद में जनता दल में मतभेद बढ़े और राजनीतिक समीकरण बदलते रहे।
जननेता के रूप में पहचान
देवीलाल की पहचान एक जननेता के रूप में थी। वे बड़े-बड़े काफिलों और तामझाम से दूर रहते थे। गांवों में बैठकर चौपाल लगाना, किसानों की समस्याएं सुनना और सीधे समाधान देना उनकी शैली थी। वे अपने स्पष्ट और बेबाक भाषणों के लिए भी प्रसिद्ध थे। उनकी सभाओं में हजारों की भीड़ उमड़ती थी, जो उनके प्रति लोगों के विश्वास को दर्शाती थी।
राजनीतिक विरासत की बात करें तो उनके परिवार ने भी हरियाणा की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके पुत्र ओम प्रकाश चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री बने और उनके पोते दुष्यंत चौटाला ने भी राज्य की राजनीति में अपनी पहचान बनाई। इस प्रकार देवीलाल का राजनीतिक प्रभाव पीढ़ियों तक कायम रहा।
देवीलाल के जीवन में संघर्ष कम नहीं थे। सत्ता से बाहर होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। वे लगातार जनसभाएं करते रहे और संगठन को मजबूत करते रहे। उनकी राजनीति का केंद्र बिंदु हमेशा किसान और ग्रामीण समाज रहा। वे मानते थे कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, और जब तक गांव मजबूत नहीं होंगे, देश मजबूत नहीं हो सकता।
6 अप्रैल 2001 को चौधरी देवीलाल का निधन हुआ। उनके निधन के साथ हरियाणा की राजनीति का एक युग समाप्त हो गया। लेकिन उनकी स्मृति आज भी जीवित है। हरियाणा में उन्हें “ताऊ देवीलाल” के नाम से सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। सिरसा में स्थापित चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय और अन्य संस्थान उनके योगदान की याद दिलाते हैं।
उनका पूरा राजनीतिक जीवन इस बात का उदाहरण है कि साधारण किसान परिवार से निकलकर भी कोई व्यक्ति देश की सर्वोच्च सत्ता तक पहुंच सकता है। उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि समाज सेवा का जरिया माना। उनकी नीतियों और संघर्षों ने हरियाणा की राजनीति को नई दिशा दी।
आज जब हरियाणा और देश की राजनीति पर नजर डाली जाती है, तो चौधरी देवीलाल का नाम सम्मान से लिया जाता है। वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक विचारधारा थे – किसान हित, ग्रामीण विकास और सामाजिक न्याय की विचारधारा। उनका जीवन संघर्ष, साहस और सेवा की मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।





