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हरियाणा का पहला मुख्यमंत्री कौन था? CM बनने का जानिए रोचक किस्सा

On: January 23, 2026 5:15 AM
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हरियाणा के गठन का इतिहास केवल एक नए राज्य के निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन व्यक्तित्वों के संघर्ष, दूरदर्शिता और राजनीतिक साहस की गाथा भी है जिन्होंने इस राज्य की नींव रखी। ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे पंडित भगवत दयाल शर्मा, जो हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री बने और जिन्होंने एक नवगठित राज्य को प्रशासनिक दिशा देने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम, समाज सुधार, गांधीवादी विचारधारा और राष्ट्र निर्माण के आदर्शों से गहराई से जुड़ा हुआ था।

जीवन परिचय –

पंडित भगवत दयाल शर्मा का जन्म 1 जनवरी 1918 को तत्कालीन पंजाब प्रांत के रोहतक जिले के बेरी गांव में हुआ था। उनका परिवार शिक्षित और राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित था। प्रारंभिक शिक्षा गांव और आसपास के क्षेत्रों में हुई, जबकि उच्च शिक्षा के दौरान वे स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित हुए। महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और लाला लाजपत राय जैसे नेताओं के विचारों ने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को आकार दिया। युवा अवस्था में ही उन्होंने यह समझ लिया था कि भारत की आज़ादी केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की भी मांग करती है।

स्वंत्रता सेनानी 

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पंडित भगवत दयाल शर्मा ने सक्रिय रूप से भाग लिया। वे भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में शामिल हुए और इस कारण उन्हें ब्रिटिश शासन द्वारा जेल भी जाना पड़ा। जेल जीवन ने उनके विचारों को और अधिक दृढ़ बनाया। वे अहिंसा, सत्य और सामाजिक न्याय के कट्टर समर्थक बन गए। आज़ादी के बाद उन्होंने सत्ता को लक्ष्य नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम माना।

हरियाणा एक अलग प्रशासनिक इकाई बनाने में योगदान

1947 के बाद जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब पंजाब एक विशाल राज्य था जिसमें वर्तमान हरियाणा भी शामिल था। इस समय भाषायी और सांस्कृतिक आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग तेज़ होने लगी। हरियाणा क्षेत्र के लोगों को यह महसूस हो रहा था कि उनकी भाषा, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं की अनदेखी हो रही है। पंडित भगवत दयाल शर्मा उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने हिंदी भाषी क्षेत्र के लिए अलग राज्य की मांग को लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से उठाया।

उन्होंने संसद और कांग्रेस के भीतर हरियाणा राज्य के पक्ष में मजबूती से आवाज़ उठाई। यह संघर्ष आसान नहीं था, क्योंकि उस समय पंजाब के विभाजन का विरोध भी हो रहा था। लेकिन उनकी तार्किक सोच, शांत स्वभाव और राजनीतिक संतुलन ने केंद्र सरकार को यह विश्वास दिलाया कि हरियाणा एक अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में सफल हो सकता है।

पहले मुख्यमंत्री का सफर 

1 नवंबर 1966 को जब हरियाणा राज्य का औपचारिक गठन हुआ, तब पंडित भगवत दयाल शर्मा को सर्वसम्मति से हरियाणा का पहला मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। यह केवल एक पद नहीं था, बल्कि एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी थी। उनके सामने एक ऐसा राज्य था, जिसकी न तो अपनी राजधानी थी, न मजबूत प्रशासनिक ढांचा और न ही पर्याप्त सरकारी संस्थान।

मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका सबसे पहला और महत्वपूर्ण निर्णय था—राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को स्थिर करना। चंडीगढ़ को अस्थायी राजधानी के रूप में स्वीकार किया गया, जो उस समय पंजाब और हरियाणा दोनों की साझा राजधानी बनी। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि नए राज्य में कानून-व्यवस्था बनी रहे और प्रशासनिक भ्रम की स्थिति न पैदा हो।

नहरों के विस्तार और सिंचाई को प्राथमिकता दी 

उनके कार्यकाल का एक बड़ा योगदान था कृषि को राज्य की आर्थिक रीढ़ के रूप में स्थापित करना। हरियाणा मूल रूप से एक कृषि प्रधान क्षेत्र था, लेकिन आधुनिक तकनीकों और सिंचाई सुविधाओं की कमी थी। पंडित भगवत दयाल शर्मा ने नहरों के विस्तार, सिंचाई परियोजनाओं और कृषि अनुसंधान को प्राथमिकता दी। उनके प्रयासों से ही आगे चलकर हरियाणा हरित क्रांति का प्रमुख केंद्र बना।

उन्होंने किसानों के हित में भूमि सुधारों को समर्थन दिया और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि छोटे और मध्यम किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिले। सहकारी समितियों को बढ़ावा दिया गया, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली। उनका मानना था कि यदि गांव समृद्ध होंगे, तो राज्य स्वतः प्रगति करेगा।

ग्रामीण हिस्सों में शिक्षा पर जोर 

शिक्षा के क्षेत्र में भी उनके निर्णय ऐतिहासिक रहे। उन्होंने ग्रामीण इलाकों में स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना पर ज़ोर दिया। उनका विश्वास था कि शिक्षा ही सामाजिक असमानता को खत्म करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। शिक्षक भर्ती, छात्रवृत्तियां और हिंदी माध्यम को बढ़ावा देने जैसे फैसले उनके दूरदर्शी सोच को दर्शाते हैं।

सामाजिक न्याय उनके राजनीतिक जीवन का मूल आधार था। दलितों, पिछड़े वर्गों और कमजोर तबकों के अधिकारों के लिए वे लगातार सक्रिय रहे। उन्होंने प्रशासन को यह स्पष्ट संदेश दिया कि सरकारी योजनाएं केवल कागज़ों तक सीमित न रहें, बल्कि ज़मीन पर लागू हों। यह उनके गांधीवादी सिद्धांतों का ही परिणाम था कि वे सत्ता में रहते हुए भी सादगी और नैतिकता को प्राथमिकता देते रहे।

हालांकि उनका पहला कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा और 23 मार्च 1967 को समाप्त हो गया, लेकिन इतने कम समय में भी उन्होंने राज्य की दिशा तय कर दी। बाद में वे 1972 से 1975 तक दोबारा हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। दूसरे कार्यकाल में उन्होंने प्रशासनिक अनुभव के आधार पर योजनाओं को और अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया।

दूसरे कार्यकाल के दौरान औद्योगिक विकास पर भी ध्यान दिया गया। फरीदाबाद, यमुनानगर और पानीपत जैसे क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहन मिला। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा हुए और हरियाणा की आर्थिक संरचना को विविधता मिली।

पंडित भगवत दयाल शर्मा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे राजनीति को सत्ता का खेल नहीं, बल्कि सेवा और नैतिक जिम्मेदारी मानते थे। वे विवादों से दूर रहते थे और संवाद को समाधान का सबसे अच्छा तरीका मानते थे। यही कारण है कि वे विरोधियों द्वारा भी सम्मानित किए जाते थे।

1981 में उनका निधन हो गया, लेकिन हरियाणा की राजनीति और प्रशासन में उनकी छाप आज भी स्पष्ट दिखाई देती है। उन्हें सही अर्थों में “हरियाणा का शिल्पकार” कहा जाता है। एक नए राज्य को पहचान देना, उसे स्थिरता देना और भविष्य की नींव रखना—यह कार्य केवल एक दूरदर्शी, ईमानदार और समर्पित नेता ही कर सकता था।

आज जब हरियाणा देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है, तो उसके पीछे पंडित भगवत दयाल शर्मा जैसे नेताओं का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश देता है कि राजनीति यदि नैतिकता, सेवा और जनकल्याण पर आधारित हो, तो वह समाज को नई दिशा दे सकती है।

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