राजस्थान का दूसरा नाम “राजपूताना” है और यह नाम केवल एक ऐतिहासिक शब्द नहीं बल्कि पूरे एक युग की पहचान है। आज जिसे हम राजस्थान कहते हैं, वह पहले अलग-अलग राजाओं और रियासतों का समूह हुआ करता था। इस पूरे क्षेत्र में मुख्य रूप से राजपूत शासकों का प्रभुत्व था, इसलिए अंग्रेज़ों ने इसे राजपूताना कहना शुरू किया जिसका अर्थ हुआ राजपूतों की भूमि। उस समय यहाँ कोई एक सरकार या एक राजधानी नहीं थी, बल्कि अनेक स्वतंत्र रियासतें थीं जिनकी अपनी सेनाएँ, कानून, मुद्रा और प्रशासन होता था। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, जैसलमेर, बूंदी, कोटा, भरतपुर और अलवर जैसी लगभग बाईस बड़ी रियासतें मिलकर इस भूभाग की पहचान बनाती थीं। अंग्रेज़ों ने प्रशासनिक सुविधा के लिए इन्हें “राजपूताना एजेंसी” के अंतर्गत संगठित किया और धीरे-धीरे यह नाम पूरे क्षेत्र का आधिकारिक नाम बन गया।
नाम कैसे चुना गया राजस्थान-
1947 में भारत आज़ाद होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि सैकड़ों रियासतों को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में कैसे जोड़ा जाए। उस समय आज का राजस्थान कई छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। 1948 से 1949 के बीच अलग-अलग चरणों में इन रियासतों का विलय हुआ और अंततः एक संयुक्त राज्य बना जिसका नाम रखा गया “राजस्थान”, अर्थात राजाओं की भूमि। यह नाम इसलिए चुना गया ताकि ऐतिहासिक पहचान भी बनी रहे और एक नई लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत भी हो सके। 30 मार्च 1949 को यह प्रक्रिया पूरी हुई और उसी दिन से आधुनिक राजस्थान का जन्म माना जाता है, इसलिए हर वर्ष 30 मार्च को राजस्थान दिवस मनाया जाता है।
जानिए असली पहचान-
राजपूताना नाम की असली पहचान केवल राजाओं की संख्या नहीं थी बल्कि उनकी वीरता और स्वाभिमान था। इस भूमि के शासक अपने सम्मान के लिए जीवन त्याग देने को तैयार रहते थे लेकिन पराधीनता स्वीकार नहीं करते थे। यहाँ के युद्ध केवल सत्ता के लिए नहीं बल्कि मर्यादा और प्रतिष्ठा के लिए लड़े जाते थे। कई बार ऐसा हुआ कि दुर्ग टूट गया पर आत्मसमर्पण नहीं हुआ। इसी कारण इतिहासकारों ने इसे वीरों की भूमि कहा। यहाँ स्त्रियों ने भी अद्भुत साहस दिखाया और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए जौहर जैसे बलिदान किए। यही परंपरा राजपूताना की आत्मा बन गई और आज भी लोकगीतों तथा कथाओं में जीवित है।
विशाल थार मरुस्थल-
भौगोलिक दृष्टि से यह प्रदेश भारत का सबसे बड़ा राज्य है जिसका क्षेत्रफल लगभग 3 लाख 42 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक है और यह देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग दस प्रतिशत हिस्सा घेरता है। पश्चिम में विशाल थार मरुस्थल फैला है जबकि पूर्वी भाग अपेक्षाकृत उपजाऊ है। अरावली पर्वतमाला इसे दो प्राकृतिक भागों में विभाजित करती है और यही पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में मानी जाती है। मरुस्थलीय क्षेत्र होने के बावजूद यहाँ जीवन ने अद्भुत अनुकूलन किया है। कम वर्षा, तेज गर्मी और कठोर जलवायु के बावजूद यहाँ की संस्कृति अत्यंत रंगीन और उत्सवप्रिय है। शायद कठिन परिस्थितियों ने ही लोगों को अधिक उत्साही और जीवंत बनाया।
आर्थिक रूप से भी यह प्रदेश अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह भारत का प्रमुख खनिज उत्पादक राज्य है जहाँ जिंक, जिप्सम, संगमरमर और चूना पत्थर के विशाल भंडार मिलते हैं। विश्व प्रसिद्ध मकराना संगमरमर इसी प्रदेश से निकलता है जिसका उपयोग ऐतिहासिक स्मारकों के निर्माण में हुआ है। पहले जहाँ पश्चिमी भाग लगभग बंजर माना जाता था वहीं नहर परियोजनाओं के बाद कृषि का तेजी से विकास हुआ और आज सरसों तथा बाजरा उत्पादन में यह अग्रणी राज्यों में गिना जाता है। पर्यटन भी यहाँ की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है क्योंकि ऐतिहासिक किले, महल और सांस्कृतिक विरासत हर वर्ष करोड़ों लोगों को आकर्षित करते हैं।
राजपूताना काल की सबसे बड़ी देन इसकी विविध संस्कृति है। अलग-अलग रियासतों के कारण हर क्षेत्र की भाषा, पहनावा और परंपराएँ अलग विकसित हुईं। मारवाड़, मेवाड़, शेखावाटी और हाड़ौती क्षेत्रों की बोलियाँ अलग हैं और लोकसंगीत में भी भिन्नता मिलती है। रंग-बिरंगे वस्त्र, पगड़ियाँ, लोकनृत्य और मेले आज भी उस राजसी परंपरा की झलक देते हैं। कठिन जलवायु के बावजूद यहाँ की कला अत्यंत सूक्ष्म और सजीव है, जो बताती है कि यह समाज केवल युद्धप्रिय ही नहीं बल्कि सौंदर्यप्रिय भी था।
आज का राजस्थान एक लोकतांत्रिक राज्य है जहाँ जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है और आधुनिक विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। शिक्षा, ऊर्जा और पर्यटन में निरंतर प्रगति हो रही है, परंतु इसकी ऐतिहासिक आत्मा अभी भी राजपूताना ही है। किले, लोककथाएँ, वीरगाथाएँ और परंपराएँ उस पुराने नाम को जीवित रखती हैं। इसीलिए कहा जाता है कि नाम बदल गया लेकिन पहचान नहीं बदली। राजपूताना इतिहास है और राजस्थान उसका वर्तमान रूप। यही कारण है कि जब भी इस प्रदेश की चर्चा होती है तो उसके आधुनिक नाम के साथ-साथ उसका पुराना गौरवशाली नाम भी स्वतः स्मरण हो जाता है।





