हरियाणा भारत का वह राज्य है जिसकी पहचान परिश्रम, सैनिक परंपरा, कृषि समृद्धि और सांस्कृतिक गौरव से जुड़ी हुई है। लेकिन हरियाणा की यह पहचान एक दिन में नहीं बनी। 1 नवंबर 1966 को पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत जब हरियाणा एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, तब उसे प्रशासनिक रूप से खड़ा करना एक बड़ी चुनौती थी। किसी भी नए राज्य की नींव मजबूत नेतृत्व और संतुलित प्रशासन पर टिकी होती है। ऐसे ऐतिहासिक और संवेदनशील समय में हरियाणा को उसके पहले राज्यपाल के रूप में एक अनुभवी और दूरदर्शी प्रशासक मिले, जिनका नाम था धर्म वीरा। वे न केवल हरियाणा के प्रथम राज्यपाल थे, बल्कि एक ऐसे प्रशासक थे जिन्होंने अपने अनुभव और संयम से नवगठित राज्य को प्रारंभिक स्थिरता प्रदान की।
धर्म वीरा के व्यक्तित्व में प्रशासनिक दृढ़ता, अनुशासन
धर्म वीरा भारतीय सिविल सेवा, यानी आईसीएस, के अधिकारी रहे थे। आईसीएस उस दौर की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा मानी जाती थी, जिसमें चयन अत्यंत कठिन प्रक्रिया से होता था। उनके व्यक्तित्व में प्रशासनिक दृढ़ता, अनुशासन और संतुलित निर्णय क्षमता स्पष्ट झलकती थी। स्वतंत्रता से पहले और बाद के संक्रमण काल में काम करने का अनुभव उनके पास था, जिसने उन्हें जटिल परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की कला सिखाई। यही अनुभव 1966 में हरियाणा के गठन के समय बेहद काम आया।
राज्यपाल की भूमिका
जब हरियाणा को पंजाब से अलग किया गया, तब यह केवल सीमाओं का बंटवारा भर नहीं था। यह प्रशासनिक ढांचे, सरकारी कर्मचारियों, संपत्तियों, संसाधनों और संस्थानों के पुनर्वितरण की भी प्रक्रिया थी। नई राजधानी की व्यवस्था, सचिवालय का गठन, विभागों की स्थापना, कानून-व्यवस्था की निरंतरता और जनता के विश्वास को बनाए रखना – ये सब अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य थे। ऐसे समय में राज्यपाल की भूमिका केवल औपचारिक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संतुलनकारी भी होती है। धर्म वीरा ने इसी भूमिका को गंभीरता से निभाया।
प्रशासनिक व्यवस्था में जबरदस्त भूमिका
हरियाणा का गठन भाषाई आधार पर हुआ था, क्योंकि पंजाबी और हिंदी भाषी क्षेत्रों के बीच लंबे समय से अलग राज्य की मांग उठ रही थी। इस पृष्ठभूमि में सामाजिक और राजनीतिक संवेदनशीलता बनी हुई थी। राज्यपाल के रूप में धर्म वीरा को यह सुनिश्चित करना था कि नई प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भी प्रकार का असंतोष या अस्थिरता न फैले। उन्होंने अपने शांत और व्यावहारिक दृष्टिकोण से सरकार और जनता के बीच विश्वास की कड़ी को मजबूत किया।
शानदार शासन और दिशा
राज्यपाल के संवैधानिक दायित्वों के अंतर्गत उन्हें नवगठित सरकार के साथ समन्वय स्थापित करना था। हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में भगवत दयाल शर्मा ने शपथ ली। एक नई सरकार और नए राज्य के बीच तालमेल बैठाना आसान नहीं था, लेकिन धर्म वीरा और मुख्यमंत्री के बीच सहयोगात्मक संबंधों ने प्रशासनिक कार्यों को गति दी। दोनों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि शासन सुचारु रूप से चले और विकास की दिशा स्पष्ट हो।
राज्यपाल की प्रशासनिक समरसता
राज्य के गठन के समय चंडीगढ़ को पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी बनाया गया। यह व्यवस्था भी अपने आप में एक विशेष परिस्थिति थी। चंडीगढ़ में दोनों राज्यों के प्रशासनिक ढांचे का संचालन करना और समन्वय बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। धर्म वीरा ने अपने अनुभव के आधार पर संतुलित निर्णय लिए और केंद्र सरकार के साथ भी निरंतर संवाद बनाए रखा, जिससे प्रशासनिक समरसता बनी रही।
धर्म वीरा का कार्यकाल भले ही लंबा नहीं था, लेकिन उसका महत्व ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत बड़ा है। किसी भी राज्य के प्रारंभिक वर्षों में लिए गए निर्णय उसके भविष्य की दिशा तय करते हैं। उन्होंने संस्थागत ढांचे को व्यवस्थित करने, संवैधानिक मूल्यों को स्थापित करने और प्रशासनिक परंपराओं को विकसित करने में योगदान दिया। उनके समय में राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को संगठित रूप मिला, जिससे आगे चलकर विकास योजनाओं को लागू करना संभव हुआ।
धर्म वीरा की पहचान केवल हरियाणा तक सीमित नहीं रही। वे देश के अन्य राज्यों में भी राज्यपाल





