एक तरफ देश विज्ञान और तकनीक के दम पर चांद और मंगल तक पहुंच बना रहा है, वहीं दूसरी ओर रोहतक जिले के कुछ गांवों में अंधविश्वास इतना हावी है कि लोकतंत्र की प्रक्रिया तक प्रभावित हो गई है। जिले के गांव सुंदरपुर और इस्माइला 9बी में हालात ऐसे बन गए हैं कि पंच पद के लिए एक भी उम्मीदवार सामने नहीं आया। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद किसी ने फॉर्म तक भरने की हिम्मत नहीं दिखाई।
मौत के डर ने रोकी चुनाव प्रक्रिया ग्रामीणों के बीच यह धारणा गहराई से फैल चुकी है कि जो भी इन वार्डों में पंच बनता है, उसकी मृत्यु हो जाती है। सुंदरपुर गांव में ऐसी तीन घटनाओं का दावा किया जा रहा है, जिसने इस डर को और मजबूत कर दिया है। बताया जा रहा है कि पिछली पंचायत में टीनू नामक व्यक्ति पंच बना था, जिसकी बीमारी के चलते मौत हो गई। उससे पहले पंच रमेश की भी बीमारी से मृत्यु हो चुकी है। इन घटनाओं के कारण लोगों में यह डर बैठ गया है कि पंच बनना अशुभ है।
संयोग या अंधविश्वास? हालांकि विशेषज्ञ इसे महज एक संयोग मानते हैं, लेकिन गांव में इसे एक अलौकिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यही वजह है कि लोग इस जिम्मेदारी से दूरी बना रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिले के अन्य 8 वार्डों में खाली पड़े पंच पदों पर सर्वसम्मति से चयन हो गया और बिना किसी चुनाव के ही पंच चुन लिए गए, लेकिन इन दो गांवों में सन्नाटा बना रहा।
प्रशासन की पहल प्रशासन ने इस स्थिति को गंभीरता से लिया है। जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी राजपाल चहल के अनुसार, ग्रामीणों में फैले इस डर को दूर करने के लिए काउंसलिंग करवाई जाएगी और उन्हें समझाया जाएगा कि यह केवल संयोग है, कोई अभिशाप नहीं। उन्होंने कहा कि जागरूकता और सही जानकारी के जरिए ही इस तरह के अंधविश्वास को खत्म किया जा सकता है।
निष्कर्ष यह मामला दर्शाता है कि आज भी समाज के कुछ हिस्सों में अंधविश्वास किस तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर असर डाल सकता है। जरूरत है जागरूकता और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की, ताकि ऐसे डर से बाहर निकलकर लोग अपनी जिम्मेदारियां निभा सकें।





